क्यों फेल हुए प्रशांत किशोर? संगठन, सत्ता और आंदोलन—इन्हीं से बनते हैं बड़े नेता! PK की हार की असली वजह

Nov 16, 2025 - 09:02
 0  0
क्यों फेल हुए प्रशांत किशोर? संगठन, सत्ता और आंदोलन—इन्हीं से बनते हैं बड़े नेता! PK की हार की असली वजह

भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी पार्टी को नई पहचान दिलाई, लेकिन इन नेताओं की सफलता सिर्फ उनके करिश्मे की वजह से नहीं थी। इसके पीछे वर्षों से बने संगठन, सत्ता का अनुभव और जनांदोलन की ताकत खड़ी थी। बिहार में प्रशांत किशोर और उनकी जनसुराज पार्टी की असफलता इसी कारण हुई—क्योंकि उन्होंने इस राजनीतिक वास्तविकता को नज़रअंदाज़ कर दिया कि भारत में बिना मजबूत संगठन या बड़े आंदोलन के सहारे, किसी भी नेता के लिए खुद की राजनीति खड़ी करना लगभग असंभव है।

आजादी के बाद के पहले चुनाव से लेकर वर्तमान तक, जिन नेताओं ने अपनी पार्टी की नैया पार कराई, वे किसी न किसी बड़े राजनीतिक स्तंभ—सत्ता, संगठन या फिर जनांदोलन—से जुड़े थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू जनता के बीच लोकप्रिय थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता उस कांग्रेस पार्टी से भी मजबूती पाती थी जो आजादी की लड़ाई में हर घर तक फैली थी। उनकी विराट छवि को संगठन और सत्ता दोनों ने उभारा।

इंदिरा गांधी भी सिर्फ नेहरू की विरासत के दम पर नहीं टिक पाईं। 1967 के झटकों के बाद उन्होंने साहसिक फैसले लिए—बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स खत्म करना और 1969 में पार्टी का विभाजन। ये फैसले सत्ता में रहते ही लिए जा सके और इसी वजह से 1971 में उनकी मजबूत छवि ने कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

1977 में जनता पार्टी की जीत भी किसी करिश्माई नेता की देन नहीं थी। यह जीत जनता क्रांति, इमरजेंसी के खिलाफ आक्रोश और कई पुराने दलों के विलय का परिणाम थी। संगठन, आंदोलन और जनभावना ने मिलकर यह सत्ता परिवर्तन किया।

1989 में वी. पी. सिंह सत्ता में आए तो इसकी वजह बोफोर्स कांड से उपजा माहौल और भाजपा-लेफ्ट का सहयोग था। लेकिन सत्ता जाते ही उनका आधार भी खत्म हो गया।

इसी तरह राज्यों में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जैसे नेता सत्ता में रहते हुए अपना सामाजिक आधार और वोट बैंक बनाने में सफल हुए। इनके पीछे वर्षों से चले संगठन, आंदोलन और राजनीतिक अनुभव खड़े थे।

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सफलता भी अन्ना आंदोलन की लहर पर खड़ी थी। यह आंदोलन के कारण बनी एंटी-करप्शन वेव थी जिसने उन्हें जनता तक पहुंचाया, अकेले उनका करिश्मा नहीं।

इसके मुकाबले प्रशांत किशोर ने बिना संगठन, बिना सत्ता और बिना आंदोलन के सिर्फ पदयात्रा और नारों के दम पर एक राजनीतिक दल खड़ा करने की कोशिश की—नतीजा वही हुआ जिसकी राजनीति में उम्मीद रहती है: असफलता।

बिहार चुनाव ने साबित कर दिया है कि नई राजनीति की बात करने से राजनीति नहीं बदली जाती। ज़मीन पर सच यह है—नए झंडे के पहले पुराने झंडे का सहारा लेना पड़ता है।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0