बिहार का वृंदावन, जहां पोखर में रंग घोलकर खेली जाती है होली....ब्रज का रंग !
बिहार में होली का पर्व पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। होली का रंग बिहार की फिजाओं में धीरे धीरे घुलने लगा है। आज हम बात करेंगे एक ऐसे होली आयोजन की जिसे बिहार का वृंदावन भी कहते हैं। ये जगह है समस्तीपुर के भिरहा गांव की। यहां की होली पूरे बिहार में सबसे अनूठी होली होती है।
बिहार के दूसरे इलाकों में लोग बाल्टी, ड्रम और दूसरे बर्तनों में रंग घोलकर होली मनाते हैं लेकिन समस्तीपुर के भिरहां गांव में पूरे पोखर में ही रंग घोल दिया जाता है। भिरहां गांव की होली पूरे बिहार की सबसे प्रसिद्ध होली होती है। यहां पर ब्रज की तर्ज पर होली मनाई जाती है। इसका भी अपना इतिहास है।
भिरहा गांव में 90 सालों से होली खेली जा रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि साल 1935 में यहां के कुछ लोग होली के महीने में घूमने के लिए वृंदावन गए हुए थें। वहां ब्रज की होली देखकर लोग मुग्ध हो उठें। यहां के लोग ब्रज की होली से इस कदर प्रभावित हुए कि वापस आने के बाद उन्होंने अपने गांव भिरहा में भी ब्रज की तरह ही होली मनाने का निर्णय कर लिया। तब से लेकर आज तक समस्तीपुर जिले के ग्राम भिरहा में ब्रज की तरह ही होली मनाई जाती है।
गांव में होली के आयोजन के लिए बाकायदा भिरहा होली सेवा दल नामक संस्था काम करती है। 1936 से ही लगातार इस गांव में ब्रज की तर्ज पर होली मनाई जाती है। वर्ष 1941 में किन्हीं कारणों से गांव तीन हिस्से में बंट गया। पुरवारी टोला, पछियारी टोला और उतरवारी टोला। तीनों ही टोलों ने होली का अलग अलग आयोजन शुरु कर दिया। बाद के दिनों में आपस में ही तीनों टोलों के बीच शानदार होली आयोजन के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होने लगी।
भिरहा गांव में होली के लिए देश के दूसरे राज्यों जैसे मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि से बैंड पार्टियों को बुलाया जाता है। तीनों टोलों के बीच बेहतरीन प्रस्तुती की होड़ रहती है। अच्छे प्रदर्शन के लिए बैंड पार्टियों को सम्मानित किया जाता है।
भिरहां गांव की होली की सबसे खास बात यह है कि यहां होली में किसी भी किस्म का हुड़दंग नहीं होता। बस प्रेम, आनंद और रंग की बारिश होती है। गांव में और आसपास में मुस्लिम आबादी भी ठीक ठाक संख्या में है लेकिन कभी कोई तनाव नहीं होता। सब उमंग और प्रेम से होली का आनंद लेते हैं। यहां की होली को सामाजिक समरसता का प्रतीक कहा जा सकता है।
भिरहा गांव में होलिका दहन के दिन नर्तकियों का नृत्य होता है। इसमें भी सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली नर्तकियों को पुरस्कृत किया जाता है।
सबसे मजेदार होली का आनंद यहां तब आता है जब सांस्कृतिक कार्यक्रमों के उपरांत गांव भर के लोग एक पोखर पर इकट्ठा होते हैं। उसमें भरपूर मात्रा में रंग घोल दिया जाता हे। लोग पोखर के रंग से एक दूसरे को रंग देते हैं। बिल्कुल ब्रज की होली का आनंद यहां महसूस होता है। इस पोखर का नाम ही फगुआ पोखर पड़ चुका है। यहां कोई एक दूसरे को जबरन रंग गुलाल नहीं लगाता।
बदलते वक्त से साथ माहौल भी बदल चुका है। दौर भी बदल चुका है लेकिन भिरहा की होली का रंग अब भी पहले की तरह ही है या यूं कह लें कि समय के साथ साथ यह गहरा होता जा रहा है।
भिरहा की होली देखकर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने इसे बिहार के वृंदावन की संज्ञा दी थी।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0