माई का लाल, बपौती जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर सीएम सम्राट चौधरी कौन सा संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं....
अब बिहार में उठे सरकारी बंगला विवाद पर सीएम सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि सरकारी बंगला किसी की बपौती नहीं है। चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा कि घर खाली करना ही होगा, कोई माई का लाल रोक नहीं सकता। ऐसी भाषा को सभ्य समाज के लोग किस रुप में देखते हैं, ये हम आप सभी जानते हैं।
My Opinion बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की भाषा को लेकर काफी समय से खूब आपत्तियां जताई जाती रहीं हैं। पहले उनके अंग्रेजी के शब्दों को लेकर मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक खूब मजाक बनाया गया वो अलग बात थीं। उच्चारण में समस्या किसी को भी हो सकती है लेकिन मंच से अपने भाषणों में सम्राट चौधरी जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो कई प्रकार के सवालों को जन्म देता है।
बपौती शब्द बड़ा प्रिय है सीएम सम्राट चौधरी को। अक्सर विरोधियों को ललकारने के अंदाज में वो कहते हैं कि ये किसी की बपौती नहीं है, वो किसी की बपौती नहीं है। इस बार उन्होंने पूर्व सीएम और बिहार विधान परिषद में विपक्ष की नेता राबड़ी देवी के आवास को लेकर हो रहे विवाद में इन शब्दों का प्रयोग किया है। वहीं माई का लाल भी उनका फेवरेट जुमला बन चुका है। क्या मुख्यमंत्री के पद पर बैठे इंसान के मुंह से ऐसी भाषा शोभा देती है ?
यह सवाल अपने आप में बड़ा हो जाता है क्योंकि आज की राजनीति में भाषा की मर्यादा खोती जा रही है। हम सभी को यह नहीं भूलना चाहिए कि हम सब किसी न किसी मां की संतान ही हैं। हम सभी को एक दूसरे की मां का सम्मान करना चाहिए और वैसे में कोई माई का लाल कहकर क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है ! किसी के पिता के लिए बपौती शब्द का इस्तेमाल !
वैसे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में तू तड़ाक जैसी भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से करने लगे थें। उन्होंने मंच से लेकर सदन तक कई आपत्तिजनक भाषाआंे का इस्तेमाल किया।
अब बिहार में उठे सरकारी बंगला विवाद पर सीएम सम्राट चौधरी कह रहे हैं कि सरकारी बंगला किसी की बपौती नहीं है। चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा कि घर खाली करना ही होगा, कोई माई का लाल रोक नहीं सकता। ऐसी भाषा को सभ्य समाज के लोग किस रुप में देखते हैं, ये हम आप सभी जानते हैं।
ऐसी भाषा का प्रयोग अपने विरोधी नेता के लिए वो भी एक महिला के लिए कम से कम सीएम की कुर्सी पर बैठे नेता के लिए शोभनीय नहीं है, हमारे विचार से। चार दिन पहले तक सम्राट चौधरी की प्रशंसा के पुल बांधने वाले तेजप्रताप यादव को भी ये नागवार गुजरा है। उन्होंने बाकायदा इसके लिए एक पोस्ट किया है और सम्मान की बात कही है।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और जनशक्ति जनता दल के अध्यक्ष तेजप्रताप यादव ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी करते हुए लिखा है कि मैं यहीं कहना चाहता हूं, राज्य के नेताओं को, विशेष कर मुख्यमंत्री और वरिष्ठ पदों पर बैठे लोगों को हमेशा संयमित और मर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। तेजप्रताप ने आगे कहा है कि किसी भी व्यक्ति पर टिप्पणी करते समय उनकी उम्र, सम्मान और सामाजिक गरिमा का ख्याल रखना आवश्यक है।
हमारी माता भी हमारे लिए सम्मान का विषय है। इसलिए किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत टिप्पणी उचित नहीं मानी जा सकती। लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैैं लेकिन संवाद हमेशा शालीन और सम्माजनक होना चाहिए। मर्यादित भाषा और आपसी सम्मान ही राजनीति की सबसे बड़ी पहचान होती है।
तेजप्रताप यादव के साथ कई विषयों पर मतभेद हो सकते हैं लेकिन यहां पर वो बिल्कुल सही कह रहे हैं। राजनीति में मर्यादा पूरी तरह से तहस नहस होती जा रही है। इस देश ने कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ मनमोहन सिंह जैसे शालीन नेताओं का दौर देखा था, आज की स्थिति सामने है। पीएम नरेंद्र मोदी हो या विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कई दफे इनके भाषणों को सुनकर लगता है कि दोनों राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि किसी व्यक्तिगत दुश्मन हो।
हमारा व्यक्तिगत विचार है कि राजनीति में भाषा की मर्यादा बनीं रहनी चाहिए। उच्च पदों पर बैठे लोगांे की भाषा उसी स्तर पर हो तो उचित है, वैसे ये दौर गिरावट का है। हम सभी उसके जिम्मेदार हैं।
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