बंगाल में चिराग का जादू चलेगा या नहीं !
बिहार में शानदार प्रदर्शन के बाद अब चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास ने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में अपने पैर जमाने की कोशिशें शुरू कर दी है।
बंगाल चुनाव में चिराग पासवान, रफीक प्रदेश अध्यक्ष, राजेश वर्मा प्रभारी....
बिहार का किला फतेह करने के बाद चिराग पासवान की पार्टी ने पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है...
सवाल बड़ा है कि क्या बिहार जैसा जादू चिराग बंगाल में कर पाएंगे ?
बंगाल में किसे लाभ या नुकसान पहुंचाएंगे चिराग पासवान ?
चिराग बंगाल चुनाव एनडीए के साथ लड़ेंगे या अपने दम पर मजबूत होंगे ?
बिहार में तो चिराग का कैडर था, बंगाल में क्या है ?
खगड़िया से चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के सांसद हैं राजेश वर्मा। चिराग पासवान ने उन्हें पश्चिम बंगाल का प्रभारी नियुक्त किया है।
वहीं पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के मोहम्मद रफीक अली कुछ दिनों पहले ही लोजपा रामविलास के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं।
लोजपा रामविलास के पश्चिम बंगाल प्रभारी सह सांसद राजेश वर्मा तीन दिनों के लिए राजधानी कोलकाता प्रवास पर जा रहे हैं। राजेश वर्मा अलग अलग कार्यक्रमों में शामिल होंगे और पार्टी के राज्य इकाई के लोगों के साथ आगमी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन करेंगे।
दरअसल आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के अलग अलग हिस्सों में खास तौर से कोलकाता, हावड़ा, वर्धमान, आसनसोल, दुर्गापुर, खड़गपुर आदि इलाकों में बड़े पैमाने पर बिहारी मूल के लोग रहते हैं। लाखों परिवार ऐसे हैं जो कई पीढ़ियों से बंगाल में रहते आ रहे हैं।
वहीं बंगाल के दो जिले मालदा और उत्तरी दिनाजपुर बिहार से सटे हुए हैं। चिराग पासवान का फोकस इन्हीं वोटरों पर है।
एक समय ऐसा था जब बिहार वोटर्स की बदौलत लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल की पश्चिम बंगाल विधानसभा में एंट्री हो गई थी। वर्ष 2006 में कोलकाता महानगर की बड़ा बाजार सीट से राजद के उम्मीदवार मोहम्मद सोहराब की जीत हुई थी।
राजद ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के समर्थन में बंगाल चुनाव लड़ना ही छोड़ दिया, हालांकि यह फायदे का सौदा साबित नहीं हुआ। कुछ बिहारी वोट जो राजद बंगाल में हासिल कर सकता था, वो भाजपा के साथ चला गया और बंगाल में भाजपा मजबूत हो गई।
बिहारी मूल के मतदाताओं में चिराग पासवान के समर्थक माने जाने वाले पासवान समाज की भी एक बड़ी आबादी है, हालांकि इनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमज़ोर है। कई लोग उनमें से हाथ से खींचने वाले रिक्शे को चलाकर या दिहाड़ी मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। चिराग पासवान की पार्टी को इस वर्ग का बड़ा समर्थन मिल सकता है।
अब बड़ा सवाल, क्या चिराग पासवान बीजेपी के साथ गठबंधन में मिलकर चुनाव लड़ेंगे या फिर उनकी पार्टी एकला चलो की राह अपनाएगी। सच्चाई यह है कि अकेले लड़ना फिलहाल चिराग पासवान के लिए कोई फायदे का सौदा नहीं होगा। अगर वो बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो जाहिर तौर पर लाभ दोनों को होगा...
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी फिलहाल सत्ता विरोधी लहर से जूझ रहीं हैं और भारतीय जनता पार्टी उन्हें कड़ी टक्कर देती हुई नजर आ रही है। उधर लेफ्ट और कांग्रेस भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की लड़ाई लड़ रही है। इस जबरदस्त और दिलचस्प सियासी माहौल में चिराग पासवान बंगाल में कैसा " जादू " कर पाते हैं...इसके लिए भविष्य का इंतजार करना होगा..
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