आनंद मोहन से उलझना कहीं जेडीयू और भाजपा के लिए महंगा न पड़ जाए......

इसमें कोई दो राय नहीं कि आनंद मोहन एक जनाधार वाले नेता हैं। अपनी जिंदगी के डेढ़ दशक जेल में गुजारने के बावजूद आनंद मोहन का बिहार के हर विधानसभा क्षेत्र में अपने चाहने वाले लोग हैं। ऐसा कोई जिला, विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र नहीं जहां पर आनंद मोहन के समर्थक नहीं हो।

May 19, 2026 - 09:00
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बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नई खलबली मची है और यह खलबली मचा दी है पूर्व सांसद आनंद मोहन ने। आनंद मोहन ने जेडीयू को थैली वाली पार्टी बता कर बैठे बिठाए विपक्ष को मुद्दा दे दिया है। उधर आनंद मोहन के बयानों पर जिस तरह से जेडीयू ने रिएक्ट किया है, वो जेडीयू को मुसीबत में डाल सकता है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि आनंद मोहन एक जनाधार वाले नेता हैं। अपनी जिंदगी के डेढ़ दशक जेल में गुजारने के बावजूद आनंद मोहन का बिहार के हर विधानसभा क्षेत्र में अपने चाहने वाले लोग हैं। ऐसा कोई जिला, विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र नहीं जहां पर आनंद मोहन के समर्थक नहीं हो। 
पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए की भारी जीत के पीछे एक फैक्टर आनंद मोहन का साथ होना भी रहा।

एक जमाने में वो बिहार के राजपूतों के एकछत्र नेता हुआ करते थें। उनके जेल जाने के बाद उनका वोट बैंक एनडीए में समाहित हो गया लेकिन जैसा की आनंद मोहन ने कहा कि टाइगर अभी जिंदा है। आनंद मोहन एक बार फिर से अपने पुराने रौब में आते हुए दिखाई दे रहे हैं। टाइगर एक बार अपने कदम बढ़ा लेता है तो फिर वो पीछे नहीं हटता। आनंद मोहन तो टाइगर भी हैं और फाइटर भी। 


आनंद मोहन ने क्या गलत कहा है ! वो तो सही ही कह रहे हैं कि उनके बेटे चेतन आनंद की वजह से बिहार की नीतीश कुमार की सरकार बची थी अन्यथा क्या होता, कुछ भी कहना मुश्किल होता। तेजस्वी यादव के खेमे से निकाल कर आनंद मोहन अपने बेटे को लेकर आएं और फ्लोर टेस्ट में नीतीश कुमार की सरकार बच गई। अगर वो अपने बेटे को मंत्री बनाने की इच्छा रखते हैं तो इसमें क्या बुरा है ! नीतीश कुमार के बेटे और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे बिना किसी सदन के सदस्य बनें मंत्री बन सकते हैं तो आनंद मोहन के बेटे में क्या बुराई है ? चेतन आनंद ने तो जनता की अदालत में जाकर दो बार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की है। 

बता दें कि बिहार में राजपूतों की आबादी लगभग 4 प्रतिशत है। 4 प्रतिशत आबादी वाला यह समाज 10 फीसदी वोटों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। आनंद मोहन की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी पत्नी लवली आनंद शिवहर से सांसद हैं जबकि उनके बेटे चेतन आनंद नवीनगर से विधायक हैं। अगर ये 4 प्रतिशत वोट एनडीए से टूटा तो एनडीए का क्या हाल होगा, यह बताने की जरुरत नहीं है। 
जनता दल यूनाइटेड को चाहिए था कि वो आनंद मोहन से बात करतें और उनकी चिंता और शिकायतों का समाधान करते लेकिन उन्होंने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस करना शुरु कर दिया और आनंद मोहन पर पलटवार करने लगें। 

अब आते हैं असली मुद्दे पर.... अगर आनंद मोहन ने नई पार्टी बना ली तो एनडीए का क्या होगा ! सोशल मीडिया पर कहा भी जा रहा है कि यादवों की अपनी पार्टी है, कोयरी, कुर्मी, पासवान, मल्लाह, मुसहर सबकी पार्टी है तो राजपूतों की क्यों नहीं हो सकती ! अतीत में आनंद मोहन की अपनी पार्टी रह चुकी है, जिसका नाम था बिहार पीपुल्स पार्टी। अगर बिहार पीपुल्स पार्टी या फिर ऐसी कोई नई पार्टी ने जन्म लिया तो एनडीए की वो मुसीबत बढ़ेगी कि फिर उन्हें आनंद मोहन को दर्जन भर विधानसभा की सीटें भी देनी पड़ेगी और उनके बेटे को मंत्री भी बनाना पड़ेगा। 

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SIMRANJEET SINGH Diploma in media studies ( Ranchi ),8 years experience in news media, Political Expert Chief editor in Bihar News