MLC उपचुनाव: अपने राज का पहला चुनाव कैसे हार गए सम्राट चौधरी....जानिए पूरा विश्लेषण
कायदे से तो यह सीट एनडीए को जीत जानी चाहिए थी। आम तौर पर उपचुनाव सत्ताधारी दल या गठबंधन ही जीतता है लेकिन यहां उल्टा हो गया। मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी यहां जीत गई या यूं कह लें कि उसने यह सीट एनडीए से छीन ली।
बीते दिनों बिहार में मुख्यमंत्री बदल गए। जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार की जगह भाजपा के सम्राट चौधरी आ गए। बिहार के राजनीतिक इतिहास के बड़े बदलावों में यह घटना भी दर्ज हो गई। मुख्यमंत्री बनने के बाद बारी आई सम्राट चौधरी की अग्निपरीक्षा की। यह अग्निपरीक्षा थी भोजपुर बक्सर स्थानीय निकाय एमएलसी उपचुनाव की।
जेडीयू के टिकट पर संदेश विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित होने की वजह से राधाचरण साह उर्फ राधाचरण सेठ को यह एमएलसी सीट खाली करनी पड़ी। सेठ जी के बेटे कन्हैया प्रसाद को टिकट मिला। परिवारवाद का एक और उदाहरण सामने आया। सामने आरजेडी के सोनू कुमार राय थें। वो भी पूर्व एमएलसी लालदास राय के बेटे हैं। दोनों तरफ से परिवारवाद आमने सामने था। उधर कार्यकर्ताओं के हक अधिकार की बात कह कर जेडीयू से बागी होकर मनोज उपाध्याय भी मैदान में उतर गए।
कायदे से तो यह सीट एनडीए को जीत जानी चाहिए थी। आम तौर पर उपचुनाव सत्ताधारी दल या गठबंधन ही जीतता है लेकिन यहां उल्टा हो गया। मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी यहां जीत गई या यूं कह लें कि उसने यह सीट एनडीए से छीन ली। स्थानीय निकाय एमएलसी चुनाव वहीं लड़ता और जीतता है जिसके पास हर तरह के साधन और संसाधन होते हैं। ये चुनाव लोकतंत्र पर काले धब्बे की तरह है। यह चुनाव लोकतंत्र को धनतंत्र में बदल देता है। इस चुनाव में वोट जनप्रतिनिधि देते हैं। मतलब नेता ही नेता को चुनता है।
जब बात साधन और संसाधन की आती है तो एनडीए इसमें पीछे नहीं है बल्कि सबसे दो हाथ आगे ही है। एनडीए प्रत्याशी कन्हैया प्रसाद और उनके पिता राधाचरण सेठ भी इस खेल के दिग्गज खिलाड़ी माने जाते हैं। जाहिर तौर पर हमेशा की तरह उन्होंने विशेष प्रयास भी किए होंगे लेकिन वो ये सीट जीतने में असफल रहें। नए सीएम सम्राट चौधरी के कार्यकाल का यह पहला चुनाव उनके लिए किसी झटके से कम नहीं होगा। इस अग्निपरीक्षा में सम्राट चौधरी कामयाब नहीं हो सकें।
पहली नजर में देखें तो यह उपचुनाव जेडीयू के बागी मनोज उपाध्याय की वजह से आरजेडी जीत गई। आरजेडी और जेडीयू के बीच इस उपचुनाव में वोटों का अंतर लगभग 340 वोटों का रहा और निर्दलीय मनोज उपाध्याय को लगभग 640 वोट मिलें। हालांकि इस नतीजे की एक खास बात यह रही कि इसमें 621 वोट रद्द भी कर दिए गए। बैलेट पेपर से हुए इस उपचुनाव में गलत तरीके से वोट अंकित करने की वजह से वोट रद्द कर दिए जाते हैं !
अब ये 621 रद्द वोट किसके थें ! ये वोट अगर रद्द नहीं होते तो क्या चुनाव परिणाम बदल सकते थें ! इसका जवाब किसी के पास नहीं है। आरजेडी समर्थकों का दावा है कि ये सारे रद्द वोट उन्हीं के थें। हालांकि सारे रद्द वोट एक पार्टी के नहीं हो सकते हैं। ये दावा थोड़ा ज्यादा हो सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि सम्राट चौधरी के कार्यकाल का पहला चुनाव एनडीए हार चुका है। एनडीए की सीटिंग सीट को जेडीयू ने छीन लिया है।
आगे बांकीपुर विधानसभा का उपचुनाव होना है जो नितिन नवीन के राज्यसभा सांसद निर्वाचित होने की वजह से खाली हो चुका है। हालांकि यहां पर भाजपा के लिए बेहद अनुकूल हालात है.... कुल मिला जुला कर इस उपचुनाव में किंग आरजेडी बनीं है पर किंगमेकर जेडीयू के बागी मनोज उपाध्याय बनें हैं। अकेले मनोज उपाध्याय ने पूरी लंका में आग लगा दी है। शाहाबाद के इलाके में यह भाजपा और जेडीयू के लिए अब चिंतन, मनन और समीक्षा का वक्त है।
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