पप्पू यादव से क्यों घबराती है सरकार ? तेजस्वी भी रहते हैं असहज..
पूर्णिया के निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जल्द ही जेल से बाहर होंगे। पप्पू यादव की गिरफ्तारी की वजह से उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। नीट छात्रा मामले में पप्पू यादव की मुखरता की सराहना पूरे बिहार में हो रही है। कहा जा रहा है इस मामले को उठाने की वजह से ही उन्हें 31 साल पुराने मामले में जेल भेज दिया गया।
यह सवाल आप सभी के मन में भी जरूर आता होगा। बिहार में रहने वाला हर व्यक्ति यह जानता है कि पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव का इतिहास चाहे जो भी रहा हो पर आज की तारीख में पप्पू यादव गरीबों के मसीहा के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
जहां सरकार नहीं पहुंच पाती, जहां विपक्ष के नेता नहीं पहुंच पाते, वहां पप्पू यादव मौजूद होते हैं। कोई भी आपराधिक घटना हो, मुसीबत में जनता हो, वहां पप्पू यादव की दस्तक जरूर हो जाती है।
बाढ़ की विभीषिका हो, संकट में बिहार के लोग हो, लोकडाउन में भूखे मरते लोग हो, पप्पू यादव सबका सहारा हैं। किसी के साथ अन्याय हो रहा हो, किसी को सताया जा रहा हो, पप्पू यादव को कोई याद कर ले, पप्पू यादव हाजिर रहते हैं।
31 साल पुराने मामले में पप्पू यादव को जेल भेज दिया जाता है। जब बेल मिल जाती है तो कई पुराने मामले भी खोल दिए जाते हैं। हालांकि पप्पू यादव को अब बेल मिल गई है। पुराने मामलों में सुनवाई के बाद एमपी एमएलए कोर्ट से जमानत मिलने के बाद अब उनका जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।
इसके पहले भी जब कोविड का दौर चल रहा था, तब पप्पू यादव को 32 साल पुराने मामले में जेल भेज दिया गया था। हालांकि उस दौर में भी पप्पू यादव गरीबों, मजदूरों, फुटपाथ पर गुजर बसर करने वालों के साथ मजबूती से खड़े थें।
उस वक्त उनके चाहने वालों ने आरोप लगाया था कि चूंकि पप्पू यादव ने सारण के भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी से जुड़ी एंबुलेंस रिपोर्ट को लेकर पूरे बिहार में आंदोलन खड़ा कर दिया था, इसका खामियाजा पप्पू यादव को भुगतना पड़ा और उन्हें जेल भेज दिया गया।
और इस बार की गिरफ्तारी भी बेवजह नहीं है। सबको पता है कि पटना में नीट छात्रा की हुई मौत के मामले को वो लगातार मजबूती से उठा रहे थें। इस मामले को लेकर वो बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ मुखर थें।
सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव अपने बागी स्वभाव और विद्रोही तेवर के लिए जाने जाते हैं। इसकी वजह से वो लगातार विवादों में भी घिरे रहते हैं। पप्पू यादव की किसी भी बड़े राजनेता से ज्यादा दिनों तक नहीं बनती क्योंकि एक तो वो अन्याय बर्दाश्त नहीं करते और दूसरा वो बेहद महत्वाकांक्षी हैं। हालांकि कांग्रेस उनके लिए अपवाद है। कांग्रेस में उन्होंने अपनी पार्टी का विलय किया लेकिन राजद के दबाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया, इसके बावजूद पप्पू यादव निर्दलीय लड़े और पूर्णिया से जीत गए। यह पहली बार था जब कांग्रेस के प्रति कोई नाराजगी पप्पू यादव ने व्यक्त नहीं किया। वो आज भी पूरी मजबूती के साथ कांग्रेस में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए कांग्रेस के साथ खड़े दिखते हैं।
पप्पू यादव अपनी आंदोलन वाली छवि और सबके दुख सुख में साथ खड़े होने की वजह से पब्लिक में तो लोकप्रिय हैं लेकिन सरकार उनके तेवरों से मुश्किल में दिखाई पड़ने लगती है।
बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि अगर पप्पू यादव को तेजस्वी यादव के जैसा राष्ट्रीय जनता दल जैसा राजनीतिक दल और संगठन मिलता तो बिहार में एनडीए इतनी मजबूत नहीं रहती। पप्पू यादव विपक्ष का रोल भी इतनी मजबूती से निभाते की सत्ता पक्ष को हिला कर रख देते।
यही वजह है कि सरकार तो पप्पू यादव से परेशान रहती ही है, विपक्ष के नेता भी पप्पू यादव से घबराते हैं। पप्पू यादव के साथ बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद का रवैया भी विचित्र किस्म का होता है। पिछले लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव को हराने के लिए तेजस्वी ने यहां तक कह दिया कि एनडीए को वोट दे दो लेकिन इनको नहीं...बावजूद पप्पू यादव जीत गए।
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