तेजस्वी की असली परीक्षा अब शुरु हुई है, एक साथ कई मोरचों पर लड़ाई लड़नी होगी।
आरजेडी के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों रामचंद्र पूर्वे से लेकर जगदानंद सिंह और अभी के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल भी कभी संगठन की मजबूती के लिए काम करते नहीं देखे गए हैं। आज की स्थिति यह है कि कई प्रखंडों में आरजेडी की कमेटी तक नहीं है और जो लोग प्रखंड अध्यक्ष बने हुए हैं, वो संगठन के लिए कोई काम नहीं करते। जिलों में भी पार्टी संगठन की स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में इस लचर हो चुके संगठन को ठीक करना तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती होगी। आरजेडी को जितनी जल्दी हो सके, एक युवा प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति करनी होगी।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में तेजस्वी यादव बिहार के सियासी महाभारत के अभिमन्यु हो चुके हैं। तेजस्वी के समक्ष कई चक्रव्यूह हैं, जिन्हें उन्हें भेदना ही होगा...आज बिहार के सियासत की बात करेंगे और राजद के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद तेजस्वी की चुनौतियों पर चर्चा करेंगे।
तेजस्वी यादव के लिए सबसे पहली कामयाबी पारिवारिक मोरचे पर हासिल करनी होगी। परिवार में टूट सबके सामने हैं। तेजप्रताप यादव अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं। बहन रोहिणी आचार्य के तोप का मुंह भी तेजस्वी की ओर ही घूम चुका है। सबसे बड़ी बहन और लोकसभा सांसद मीसा भारती फिलहाल तेजस्वी के साथ और तेजस्वी के पक्ष में दिखाई पड़ रही हैं। पिता लालू प्रसाद यादव के आर्शीवाद से तेजस्वी कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, हालांकि तेजप्रताप यादव के मकर संक्राति भोज में भी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव नजर आए थें। माता राबड़ी देवी तो एक मां हैं, इसलिए दोनों बेटों की तरफ उनका झुकाव है।
तेजस्वी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी का लचर हो चुका संगठन है। एक समय था जब बिहार के हर गांव, गली, मुहल्ले में राजद के कार्यकर्ता नजर आते थें। लालू प्रसाद यादव भले ही सामाजिक न्याय की राजनीति करते थें लेकिन हर जाति और धर्म में राजद के नेता, कार्यकर्ता और पदाधिकारियों की मौजूदगी थी। धीरे धीरे यह राजनीति माई समीकरण के अंदर आकर सिमट गई और पार्टी का संगठन ध्वस्त हो गया।
आरजेडी के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों रामचंद्र पूर्वे से लेकर जगदानंद सिंह और अभी के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल भी कभी संगठन की मजबूती के लिए काम करते नहीं देखे गए हैं। आज की स्थिति यह है कि कई प्रखंडों में आरजेडी की कमेटी तक नहीं है और जो लोग प्रखंड अध्यक्ष बने हुए हैं, वो संगठन के लिए कोई काम नहीं करते। जिलों में भी पार्टी संगठन की स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में इस लचर हो चुके संगठन को ठीक करना तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती होगी। आरजेडी को जितनी जल्दी हो सके, एक युवा प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति करनी होगी।
तेजस्वी के लिए तीसरा चैलेंज अपने महागठबंधन को बचाए रखने का है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इंडिया गठबंधन को कायम रखना तेजस्वी के लिए बेहद जरुरी है। आरजेडी, कांग्रेस, वामदल और वीआईपी इन सभी के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। अभी एक दूसरे के खिलाफ टीका टिप्पणी करना और हार के लिए एक दूसरे पर प्रहार करने से सामने वाले को यानी एनडीए को मजा मिलेगा। आपस में सिर फुटौव्वल से हासिल कुछ नहीं होगा। तेजस्वी यादव अब आरजेडी के सबसे बड़े नेता हैं। इसके साथ ही वो बिहार में महागठबंधन का भी सबसे बड़ा चेहरा हैं।
अब बात करते हैं तेजस्वी के लिए सबसे निर्णायक जंग की तो यह लड़ाई एकजुट एनडीए से है। केंद्र की सत्ता में बैठी सरकार और बिहार की सत्ता में बैठी सरकार से तेजस्वी को लड़ाई लड़नी है। मीडिया पर कब्जा उनका है। मशीनरी और संसाधन उनके पास है। एनडीए के वोट बैंक को तोड़ना तेजस्वी के लिए कठिन तो है लेकिन हर हाल में तेजस्वी को एनडीए के कम से कम पांच छह प्रतिशत वोट बैंक को तोड़कर अपने पाले में लाना होगा। उसके लिए तेजस्वी को ए टू जेड की पाॅलिटिक्स को धार देनी होगी। जिस दिन यह काम तेजस्वी ने कर लिया, उस दिन बिहार तेजस्वी का हो जाएगा।
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