पहले के मोपेड में पैडल क्यूं होते थें ! जानकारी बड़ी दिलचस्प है.....

आज की नई पीढ़ी जो स्कूटर और बाइक देखते हुए बड़ी हुई है, उसे यह जानकर बड़ा अजीब लगेगा कि मोटर वाली गाड़ी में पैडल क्यूं लगी रहती थी। आज भी कई घरों के कोने में मोपेड खड़ा मिल जाता है। नई पीढ़ी के लिए यह कौतूहल का विषय होता है।

May 9, 2026 - 10:33
May 9, 2026 - 10:39
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पहले के मोपेड में पैडल क्यूं होते थें ! जानकारी बड़ी दिलचस्प है.....

आप में से कई लोगों ने मोपेड जरुर देखे होंगे या फिर इस्तेमाल भी किए होंगे। उस जमाने में लोग मोपेड की व्याख्या खुद से किया करते थें मोटर और पैडल का कॉम्बो। मोपेड में इंजन भी होता था और पैडल भी। पैडल देने की एक ही वजह हुआ करती थी कि खराब होने की स्थिति में या फिर जहां पर ढलान हो तो वहां पर राइडर पैडल मारकर काम चला सके। दौर बदला, नई टेक्नोलॉजी आई और फिर पैडल भी गायब हो गया। 

आज की नई पीढ़ी जो स्कूटर और बाइक देखते हुए बड़ी हुई है, उसे यह जानकर बड़ा अजीब लगेगा कि मोटर वाली गाड़ी में पैडल क्यूं लगी रहती थी। आज भी कई घरों के कोने में मोपेड खड़ा मिल जाता है। नई पीढ़ी के लिए यह कौतूहल का विषय होता है। 

शुरुआती दौर में मोपेड 50 सीसी के दो स्ट्रोक इंजनों के साथ बनाया जाता था। ये इंजन बेहद हल्के, सरल और सस्ते हुआ करते थें। इनका पावर काफी कम यानी एक घास काटने वाली मशीन जितनी हुआ करती थी। कहीं कहीं पर ये मोपेड चलने के दौरान फंस जाया करती थी। मोपेड बनाने वालों के दिमाग में एक दिलचस्प आइडिया आया। उन्होंने मोपेड में छोटे इंजन को साइकिल के पार्ट्स के साथ जोड़ दिया। 

पैडल लगने के बाद मोपेड्स की डिमांड बढ़ गई क्योंकि ये चलाने वालों के लिए काफी फायदेमंद साबित होने लगा। इंजन बंद हो जाने की स्थिति में या फिर स्टार्टिंग प्रॉब्लम इससे हल होने लगा। इसके बाद से ही लोग मोपेड को मोटर और पेडल का अनोखा जोड़ बताने लगें। इसकी नई परिभाषा बना दी गई। 

मोपेड अपने जमाने की हसीना सवारी तो थी ही लेकिन हसीनों की तरह नखरे भी बहुत करती थी। अलग अलग कारणों से यह रह रहकर बंद हो जाया करती थी। ऐसे मुश्किल समय में पैडल बड़ा काम आता था। हालांकि मोपेड साइकिल से ज्यादा भारी हुआ करती थी। इसमें पैडल मारना आसान नहीं हुआ करता था लेंकिन इतना तो था कि आप फंसे नहीं रह सकते थें। धीरे धीरे ही सही, ताकत लगाकर कम से कम इसे अपने घर या मैकेनिक के शॉप तक तो ले ही जा सकते थें। 

वहीं दूसरी तरह जब रास्ता चढ़ने वाला होता था या फिर पहाड़ी जैसा तो इस मोपेड के इंजन कमजोर पड़ने लगते थें। ऐसे समय में पैडल इंजन को मदद करता था और इसे एक्स्ट्रा पुश मिल जाता था और चढ़ाई पूरी हो जाती थी। इससे अच्छा खास शारीरिक व्यायाम भी हो जाता था। 

फिर वक्त बदला तो टेक्नोलॉजी भी आगे बढ़ी। इंजन लगातार पॉवरफुल और भरोसेमंद होते गए। किक या पैडल की जगह सेल्फ स्टार्ट ने ले ली। ऑटोमैटिक गियर ने राइडिंग को इतना सुविधाजनक और सरल बना दिया कि पैडल बीते जमाने की बात होकर रह गई। पैडल अब सिर्फ साइकिलों में नजर आने लगें। 

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SIMRANJEET SINGH Diploma in media studies ( Ranchi ),8 years experience in news media, Political Expert Chief editor in Bihar News